आज हम बात करेंगे एक ऐसे शख्स के बारे में जो जीते जी भी एक पहेली बना रहा और मरने के बाद उसकी मौत भी एक पहेली ही बनी हुई है . उसकी मौजूदगी एक वर्ग के लिए उत्साहवर्धन बनती थी तो दुसरे वर्ग के लिए दहशत .सवर्णों के लिए वह मसीहा बना रहा तो दलितों के लिए मौत का दूसरा नाम . नब्बे के दशक में बिहार में हुई नरसंहारो में सैकड़ो लोग मारे गए .इसे वर्ग संघर्ष का नाम दिया गया ,जातीय नरसंहार कहा गया लेकिन इन सभी के बीच जो नाम रहा वह नाम था “मुखिया जी “...भोजपुर के खोपीरा गाँव से निकलकर नब्बे के दशक में कैसे यह नाम मध्य और दक्षिण बिहार के गाँवों में कही “मौत का दूसरा नाम” तो कही एक खास वर्ग के लिए “मसीहा” बना, यह किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं है . लेकिन १ जून २०१२ को बरमेश्वर सिंह उर्फ़ मुखियाजी को उनके घर के पास ही गोलियों से भुन डाला गया . लेकिन जीते जी एक पहेली बने रहने वाले मुखिया जी की मौत ने पुरे बिहार को हिला कर रख दिया . भोजपुर से लेकर पटना की सडको तक आतंक की जो कहानी बनी जो तस्वीर दिखी वह लोगो को आज भी दहला देती है ,उसकी यादे रौंगटे खड़े कर देती है .लेकिन बरमेश्वर मुखिया की मौत के आठ साल बाद भी मौत की इस “मर्डर मिस्ट्री” को सुलझाया नहीं जा सका है . न तो राज्य सरकार द्वारा बनाई गई एस आई टी ने और न ही सी बी आई के हाथ हत्यारों तक पहुंचे है . आखिर इन आठ सालो में जाँच कहा तक पहुंची और कौन था बरमेश्वर मुखिया का दुश्मन यह आज समझने की कोशिश करेंगे ...
लेकिन उसके पहले यह जान लेना आवश्यक है की पतली दुबली काया वाला यह इन्सान कैसे और क्यों बना खोपीरा के बरमेश्वर से आतंक का मुखिया जी ? आखिर क्यों यह सवर्णों के लिए ख़ास तो दलितों के लिए अभिशाप बना ? इसके लिए आपको ले चलते है नब्बे के दशक में जब मध्य बिहार और भोजपुर की धरती कभी दलितों तो कभी सवर्णों के खून से रक्तरंजित होती थी . जब लाशो के ढेर लग जाते थे ,कोई अपना बेटा खोता था तो कोई अपना पति ,किसी की माँ मरती थी तो किसी की बहन ....यहाँ तक की कोख का बच्चा भी नहीं बचता था . वैसे तो बिहार में कुछ नरसंहार नब्बे के दशक के पहले भी हुए थे लेकिन १२ फ़रवरी १९९२ को गया के बारा में हुए नरसंहार ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था . तब अगड़ी जाति के ३५ लोगो की गला रेत कर हत्या कर दी गई थी . पूरी सिस्टम हिल गयी थी . इसके बाद से सवर्णों की छोटे छोटे टुकडो में बंटी निजी सेना और संघटन एक साथ आये और फिर उसके बाद सितम्बर १९९४ में सवर्णों की एक सेना बनी जिसका नाम रखा गया “रणवीर सेना “ . रणवीर सेना की कमान सौपी गई भोजपुर के खोपीरा गाँव के रहने वाले बरमेश्वर मुखिया को .१९९६ में भोजपुर के बथानी टोला में दलित ,मुस्लिम और पिछड़ी जातियों के २२ लोगो की हत्या कर दी गई . इसे बारा नरसंहार का बदला बताया गया . इसके बाद ३० नवम्बर १९९७ की रात जहानाबाद के लक्ष्मण पुर बाथे नरसंहार हुआ. जिसमे रणवीर सेना ने ५८ लोगो की हत्या कर दी . मासूमो और गर्भवती महिलाओ तक को नहीं छोड़ा गया . इसको भी बारा नरसंहार का बदला ही बताया गया . तब तक रणवीर सेना भोजपुर और मध्य बिहार में “मौत का दूसरा नाम “ बन चुकी थी . बरमेश्वर मुखिया की संघटन शक्ति के कारण संघटन को अत्याधुनिक हथियार मिल चुके थे . इसके बाद २५ जनवरी १९९९ को जहानाबाद के शंकर बीघा में फिर २२ दलितों की हत्या कर दी गई . लेकिन नक्सली संघटन भी चुप नहीं बैठे . बाथे और शंकर बीघा का बदला १८ मार्च १९९९ को सेनारी में लिया गया . जब एमसीसी ने सेनारी गाँव में स्वर्ण जाति के ३४ लोगो की हत्या कर दी . गोलियों से भुना गया , गला रेत दिया गया . एक बार फिर रणवीर सेना को चुनौती दी गई थी . मध्य और दक्षिण बिहार का यह इलाका खून से लाल हो गया था . रणवीर सेना पर बदला लेने के लिए कमांडरो का भारी दबाव था लेकिन दिन,समय और जगह तय करने की जिम्मेदारी मुखिया जी पर ही थी ,और फिर १६ जून २००० को औरंगाबाद और अरवल की सीमा से लगे मियांपुर में एक बड़े नरसंहार को अंजाम दिया गया .३५ लोगो की हत्या कर दी गई . मरने वालो में यादव और दलित थे . इस नरसंहार को सेनारी काण्ड का बदला बताया गया. अब तक बरमेश्वर मुखिया को २२७ लोगो की हत्या और उनसे जुड़े २२ अलग अलग मामलो का आरोपी बनाया जा चुका था . बिहार के मोस्ट वांटेड की लिस्ट में पहले नंबर पर मुखिया थे ..बरमेश्वर मुखिया को जिन्दा या मुर्दा पकड़ना बिहार पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी और आखिरकार २९ अगस्त २००२ को पटना के एग्जीविशन रोड स्थित एक अपार्टमेंट से बरमेश्वर मुखिया को गिरफ्तार किया गया था . तब पटना के एसएसपी थे सुनील कुमार और पकड़ने वाले थे इन्स्पेक्टर कर्मलाल .गिरफ़्तारी के बाद ९ साल तक बरमेश्वर मुखिया बिहार के अलग अलग जेलों में रहे . जिसके बाद ८ जुलाई २०११ को जेल से जमानत पर रिहा हुए . जो २२ मामले में उन्हें आरोपी बनाया गया था उनमे १६ में अदालत ने मुखिया को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था जबकि छ मामलो में जमानत दी गई थी . जेल से रिहा होने के बाद भी बरमेश्वर मुखिया अपने लोगो और संघटन के बीच भरोसे के रहे . हालाँकि इस दौरान नरसंहारो का सिलसिला थम गया था . संभवत मियांपुर के बाद इन इलाको में कोई भी दूसरा बड़ा नरसंहार नहीं हुआ था . इसलिए ५ मई २०१२ को बरमेश्वर मुखिया ने “भारतीय राष्ट्रवादी किसान संघटन “ के नाम से अपना नया संघटन बनाया . इस बीच चर्चा होने लगी की बरमेश्वर मुखिया इस संगठन के साथ चुनाव मैदान में उतरेंगे .बरमेश्वर मुखिया ने रणवीर सेना के गठन से लेकर अब तक अपने संघटन क्षमता का परिचय दे दिया था जिसके कारण संगठन से जुड़े कई लोगो को परेशानी होने लगी थी ......लेकिन क्या सिर्फ “भारतीय राष्ट्रवादी किसान संघटन “ का गठन ही बरमेश्वर मुखिया की हत्या का कारण बना या फिर हथियारों की बड़ी खेप जो मुखिया जी के जेल जाने के बाद संघटन से जुड़े लोगो के पास था ? आखिर क्या वजह रही की अपने ही दुश्मन बन गए ? आखिर आठ साल की जाँच के बाद भी सी बी आई के हाथ क्यों खाली है ? इन तमाम सवालो के जवाब पाने के लिए इंतजार कीजिये “खबरों के पोस्टमार्टम “ की अगली कड़ी का ..क्रमश ......

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